रतलाम / मोइचार्नी
भीषण गर्मी के बीच जहां ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट लगातार गहराता जा रहा है, वहीं मोइचार्नी क्षेत्र के बोरपाड़ा गांव ने सामूहिक एकता, परंपरा और श्रमदान की मिसाल पेश कर पूरे क्षेत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। वर्षों से गंदे और दूषित पानी की समस्या से जूझ रहे ग्रामीणों ने आखिरकार ‘हलमा’ के माध्यम से अपने गांव के एकमात्र सार्वजनिक कुएं को फिर से जीवित कर दिया। ग्रामीणों का यह प्रयास अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
जानकारी के अनुसार बोरपाड़ा गांव का सार्वजनिक कुआं पिछले करीब तीन वर्षों से मिट्टी, पत्थरों और मलबे से भरा हुआ था। शासन द्वारा निर्मित यह कुआं अधूरा होने के कारण हर बारिश में उसमें भारी मात्रा में मिट्टी जमा हो जाती थी। परिणामस्वरूप कुएं का पानी दूषित हो चुका था और ग्रामीण मजबूरी में उसी पानी का उपयोग करने को विवश थे। कई बार पंचायत स्तर पर समस्या उठाई गई, लेकिन समाधान नहीं निकल सका।
इसी दौरान वाग्धारा संस्था एवं ग्राम स्वराज समूह द्वारा आयोजित बैठक में ग्रामीणों ने पेयजल संकट का मुद्दा प्रमुखता से रखा। बैठक में सामूहिक सहमति से पारंपरिक आदिवासी पद्धति ‘हलमा’ के माध्यम से श्रमदान कर कुएं की सफाई करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद 6 मई को पूरे गांव ने एकजुट होकर श्रमदान अभियान चलाया।
सुबह पारंपरिक गीतों और नारों के साथ गांव में रैली निकाली गई। इसके बाद ग्रामीण गैंती, फावड़ा और तगारी लेकर कुएं की सफाई में जुट गए। महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों ने भी उत्साहपूर्वक भागीदारी निभाई। दिनभर चले अभियान में कुएं से भारी मात्रा में मिट्टी और पत्थर बाहर निकाले गए। शाम तक कुआं पूरी तरह साफ हो गया और उसमें स्वच्छ पानी भरने की स्थिति बन गई।
ग्रामीणों ने इसे केवल पानी की समस्या का समाधान नहीं, बल्कि गांव की एकता, आत्मनिर्भरता और सामूहिक शक्ति की जीत बताया। यह पहल अब आसपास के गांवों के लिए भी प्रेरणा बनती नजर आ रही है।
इस दौरान विष्णु निनामा, धूल सिंह वसुनिया, दौलतराम डामर, विष्णु वसुनिया, रामचंद्र वसुनिया, नानजी डामर, राकेश वसुनिया सहित वाग्धारा संस्था की सहजकर्ता टीम, ग्राम स्वराज समूह के सदस्य, गांव के वरिष्ठजन, महिलाएं, युवा एवं बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे।
रिपोर्टर : जितेंद्र कुमावत