नई दिल्ली। राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लेकर एक बार फिर देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि उसके कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। कांग्रेस का यह रुख वर्ष 1937 में लिए गए उसके पुराने निर्णय पर आधारित है। वहीं भाजपा और केंद्र सरकार की ओर से कांग्रेस के इस निर्णय की आलोचना की जा रही है।
वंदे मातरम् मूल रूप से छह अंतरों की रचना है। इसके शुरुआती दो अंतरों में भारतभूमि की प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली, समृद्धि और मातृभूमि के प्रति प्रेम का भाव प्रमुख रूप से दिखाई देता है। यही दो अंतरे आज सार्वजनिक रूप से सबसे अधिक प्रचलित हैं।
पहले दो अंतरों में क्या है?
पहले अंतरे में मातृभूमि को सुजलाम-सुफलाम, हरियाली से भरपूर और शीतल वायु वाली धरती के रूप में नमन किया गया है। दूसरे अंतरे में चांदनी रात, फूलों से सजे वृक्ष, मधुर भाषा बोलने वाली और सुख-समृद्धि देने वाली मातृभूमि का सुंदर चित्रण किया गया है।
इन दोनों अंतरों में प्रकृति और मातृभूमि की सुंदरता का भाव प्रमुख है।
बाकी चार अंतरों में क्या है?
वंदे मातरम् के तीसरे अंतरे से रचना का स्वर अधिक धार्मिक और आध्यात्मिक हो जाता है। इसमें मातृभूमि को शक्ति और सामर्थ्य का प्रतीक बताया गया है। करोड़ों देशवासियों की शक्ति और उनकी भुजाओं के पराक्रम का उल्लेख करते हुए मातृभूमि की महिमा का वर्णन किया गया है।
चौथे अंतरे में भारत माता का देवी स्वरूप सामने आता है। इसमें मातृभूमि की तुलना दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे देवी स्वरूपों से की गई है। यही वह हिस्सा है जिसे लेकर धार्मिक प्रतीकों के कारण लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक चर्चा होती रही है।
पांचवें और छठे अंतरों में भी मातृभूमि की स्तुति, उसके पवित्र एवं ज्ञानमय स्वरूप और उसके प्रति समर्पण का भाव आगे बढ़ता है।
1937 में क्यों चुने गए केवल दो अंतरे?
कांग्रेस का कहना है कि वर्ष 1937 में सार्वजनिक राजनीतिक कार्यक्रमों के लिए वंदे मातरम् के पहले दो अंतरों को इसलिए स्वीकार किया गया था, क्योंकि इनमें धार्मिक प्रतीकों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और इन्हें सभी समुदायों के लिए अधिक स्वीकार्य माना गया।
कांग्रेस अब इसी पुराने निर्णय का हवाला देते हुए अपने कार्यक्रमों में पहले दो अंतरे गाने की नीति पर कायम है।
विवाद आखिर है किस बात पर?
विवाद केवल गीत गाने या न गाने का नहीं, बल्कि वंदे मातरम् के मूल स्वरूप और उसके कितने हिस्से को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया जाए, इस बात का है।
कांग्रेस का पक्ष है कि पहले दो अंतरे राष्ट्रीय एकता और सभी वर्गों की स्वीकार्यता के लिहाज से उपयुक्त हैं। दूसरी ओर भाजपा और केंद्र सरकार का तर्क है कि वंदे मातरम् एक ऐतिहासिक राष्ट्रगीत है और उसकी मूल रचना के साथ किसी प्रकार की कटौती नहीं होनी चाहिए।
इस पूरे विवाद को समझने के लिए यह अंतर करना जरूरी है कि कांग्रेस वंदे मातरम् के चार अंतरों को मूल रचना से हटाने की मांग नहीं कर रही है, बल्कि अपने राजनीतिक कार्यक्रमों में पहले दो अंतरों को ही गाने की अपनी पुरानी नीति पर कायम है।
राष्ट्र के नाम एक विचार
वंदे मातरम् केवल कुछ पंक्तियों का गीत नहीं है। यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इसने लाखों भारतीयों में देशभक्ति और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना जगाई।
आज जब इसके अंतरों को लेकर राजनीतिक बहस हो रही है, तब आवश्यकता इस बात की है कि इस ऐतिहासिक रचना को केवल राजनीतिक विवाद के चश्मे से न देखा जाए। इसके साहित्यिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व को समझते हुए स्वस्थ एवं तथ्यपूर्ण चर्चा हो।
SSE NEWS
विचारधाराएं अलग हो सकती हैं, राजनीतिक मतभेद भी हो सकते हैं, लेकिन मातृभूमि के प्रति सम्मान और राष्ट्र की एकता सर्वोपरि रहनी चाहिए। यही वंदे मातरम् की मूल भावना को सच्चा सम्मान होगा।
वंदे मातरम्।