भोपाल/ रतलाम
मध्य प्रदेश के नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने वर्ष 2020-21 के दौरान विभिन्न नगर निकायों में हुए कथित वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताओं के मामलों में करीब चार वर्ष बाद विभागीय कार्रवाई की है।
विभागीय जांच पूरी होने के बाद कई अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ वेतनवृद्धि रोकने पदोन्नति पर रोक अनिवार्य सेवानिवृत्ति तथा पेंशन में कटौती जैसी कार्रवाई की गई है। हालांकि इन कार्रवाइयों के साथ सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि अनियमितताएं इतनी गंभीर थीं तो इनके खिलाफ कार्रवाई करने में चार साल का समय क्यों लगा।
जानकारी के अनुसार विभाग ने स्टॉप डेम निर्माण कोरोना काल में सामग्री खरीद तालाबों के निर्माण एवं सौंदर्यीकरण नीलामी प्रक्रिया तथा भूमि एवं राजस्व मामलों में सामने आई अनियमितताओं की जांच आयुक्त स्तर पर कराई थी। जांच रिपोर्ट के आधार पर संबंधित अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई।
सतना जिले की नागौद नगर परिषद में स्टॉप डेम निर्माण कार्य में अनियमितताएं पाए जाने पर तत्कालीन मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) संजय पांडेय को एक वर्ष तक पदोन्नति के लिए अपात्र घोषित किया गया।
अनूपपुर जिले की जैतहरी नगर परिषद में कोरोना काल के दौरान सामग्री खरीद भूमि और राजस्व मामलों में गड़बड़ियां सामने आईं।
इस मामले में भंडार प्रभारी मोहित शर्मा प्रभारी मुख्य लिपिक एवं लेखपाल रजनीश लहंगीर तथा स्वच्छता प्रभारी संजीव राठौर की चार-चार वेतनवृद्धियां रोकी गई हैं।
वहीं प्रभारी सीएमओ भूपेंद्र सिंह और राजस्व निरीक्षक अवधेश बीझी की दो-दो वेतनवृद्धियां रोकी गईं। इसके अलावा शासकीय विद्यालय की भूमि एवं राजस्व संबंधी मामले में अनियमितता पाए जाने पर सेवानिवृत्त प्रभारी मुख्य नगर पालिका अधिकारी राममिलन तिवारी की पेंशन का 10 प्रतिशत हिस्सा स्थायी रूप से काटने का निर्णय लिया गया।
रतलाम जिले की पिपलौदा नगर परिषद में नीलामी प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं मिलने पर प्रभारी सीएमओ अरुण पाठक की तीन वेतनवृद्धियां रोक दी गईं।
शहडोल नगर निगम में मोहनराम मंदिर तालाब सौंदर्यीकरण कार्य में अनियमितताओं के मामले में उप यंत्री देवकुमार गुप्ता और सहायक यंत्री बृजेंद्र प्रसाद शर्मा की तीन-तीन वेतनवृद्धियां रोकी गईं।
इसी तरह धार नगर निगम के देवीसागर तालाब निर्माण एवं सौंदर्यीकरण कार्य में गड़बड़ी पाए जाने पर उप यंत्री सुधीर ठाकुर तथा सहायक यंत्री देवेंद्र कोल की एक-एक वेतनवृद्धि रोकने की कार्रवाई की गई।
विभाग का कहना है कि सभी कार्रवाइयां विभागीय जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की गई हैं। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम ने शासन की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अनियमितताओं की पहचान समय रहते हो जाती और तत्काल कार्रवाई होती तो सरकारी धन के संभावित नुकसान को कम किया जा सकता था।
यह मामला केवल संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई तक सीमित नहीं है बल्कि सरकारी तंत्र की जवाबदेही, समयबद्ध जांच और वित्तीय निगरानी प्रणाली की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। चार साल बाद हुई कार्रवाई यह संकेत देती है कि भ्रष्टाचार या अनियमितताओं के मामलों में जांच और दंड प्रक्रिया अभी भी अपेक्षित गति से दूर है।
अब देखना होगा कि विभाग भविष्य में ऐसी अनियमितताओं को रोकने के लिए निगरानी तंत्र को कितना मजबूत बनाता है।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत