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नवरात्रि पर विशेष आगर-मालवा जिले के तनोडि़या में प्रसिद्ध लालबाई माता का मंदिर गांव के पश्चिमी छोर पर पिपलोनकलां रोड पर स्थित है। नवरात्रि में यहां प्रतिदिन सैकड़ों दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है। बताया जाता है कि माताजी की प्रतिमा 600 साल से अधिक पुरानी है। माताजी वर्तमान मंदिर के पीछे स्थित एक वृक्ष से प्रकट हुई थी। नगर में नौ देवियों का वास है लाल माता फूलबई, करणी माता, वाक वेराई माता, हरसिद्धि माता, खोडियाल मां, चामुंडा मां, खोखा माता, शीतला माता आदि माता मंदिर है। क्षैत्र में लाल माता के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। जनश्रुति है कि अंग्रेज शासन काल में जब आगर में सैनिक छावनी थी तब एक घटना के अनुसार अंग्रेज कैप्टन घूमता हुआ माताजी के मंदिर पहुंचा। उस समय मंदिर में देवी की जत्रा चल रही थी। उस अंग्रेज ने लोगों से पूछा यह क्या हो रहा है तो लोगों ने बताया यह देवी मां है। सर्वज्ञ है, सब बता सकती हैं। अंग्रेज कैप्टन ने पूछा घोड़ी के पेट में क्या है? तब मां ने बताया घोड़ी के पेट में जो बच्चा है उसके चारों पैर सफेद हैं और माथे पर पान की आकृति बनी हुई है। स्थानीय श्रृद्धालुओं ने बताया कि अंग्रेज ने तुरंत रिवाल्वर निकाली और घोड़ी को गोली मार दी और एक व्यक्ति को बुलाकर घोड़ी का पेट चिरवाया, तो यह देखकर वह हैरान रह गया कि सचमुच घोड़ी के बच्चे के पैर मां के बताए अनुसर ही थे। कैप्टन मां को नमन कर चला गया। इसके बाद जब भी अंग्रेजी सैनिक टुकड़ियां तनोड़िया से निकलती तो मां को नमन अवश्य करती थी। इसके अलावा भी माताजी के मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं प्रचलित हैं। बालक-बालिकाओं को माता (चेचक) निकलने पर दूरदराज के श्रद्धालु आकर माथा टेकते हैं तथा इस बीमारी से ग्रसित व्यक्ति को माता का नाम लेने मात्र से ही राहत मिल जाती है। मंदिर से रोज कई लोग पवित्र जल (नीर) एवं विभूति लेकर जाते हैं और पीड़ितों को खिलाते है। जिससे पीड़ित व्यक्ति शीघ्र ही स्वस्थ्य हो जाता है। निसंतान दंपती भी यहां संतान प्राप्ति के लिए मन्नत मांगते हैं, जो माता की कृपा से पूरी भी होना बताया जा रहा है। जनश्रुति यह भी है कि लालमाता के मंदिर से नवरात्रि में दिव्य ज्योति जलती हुई प्रतीत होती थी, जो यहां से तनोडि़या के आसपास के देवी मंदिरों से होती हुई पुनः लाल माता के मंदिर में आकर विलोपित हो जाती थी। बुजुर्गों के अनुसार 40 के दशक में माता की सेवा करने वाले पुजारी स्व. बृजलाल चौधरी बताया करते थे कि रियासतकाल में तत्कालीन जागीरदार परिवार के प्रमुख की लश्कर ग्वालियर की कचहरी में जमीन संबंधी पेशी थी। वह समय नवरात्रि का था। नवरात्रि के दिनों में जागीरदार परिवार की ठकुराइन ने मां से प्रार्थना कर कहा कि आपकी पूजा करने वाला तो पेशी पर सैकड़ों मील दूर बैठा है, अब में कैसे आपकी पूजा पूर्ण करूं। बताया जाता है कि ठकुराईन की इस करुण पुँकार पर लाल माता ने लश्कर में मामले की सुनवाई करने वाले जज को सोते से जगाया और कहा कि तेरी कचहरी में तनोड़िया के जागीरदार की पेशी है उसे छोड़ देना। मना करने पर मां ने शेर पर सवार त्रिशूलधारी रूप दिखाया। दूसरे दिन जज ने जागीरदार को कचहरी में बुलाकर मां के रूप का वर्णन करते हुए कहा तनोड़िया गांव में लालमाताजी का मंदिर है, उन्होंने मुझे तुम्हे छोड़ देने का आदेश दिया है। तब जागीरदार ने वहां से तनोडि़या आकर मां की पूजा-अर्चना कर मॉं को नमन किया। चेचक रोग से बचाव के लिए पवित्र जल ( नीर) ले जाते हैं श्रद्धालु श्री लाल माता मंदिर से थोड़ा आगे थड़ौदा गांव के निकट फूलबाई माता का मंदिर स्थित है। इसके बारे में कहा जाता है कि श्री लालबाई, श्री फूलबाई दोनों बहनें हैं। एक अन्य किस्से के अनुसार 1945 व 1946 में बारिश में बीमारियों का प्रकोप हुआ था, लेकिन लाल माता की कृपा से तनोड़िया क्षेत्र में एक भी व्यक्ति बीमारी से ग्रस्त नहीं हुआ। जबकि आसपास के इलाकों में जानलेवा बीमारियों से सैकड़ों मौत हुई थी। आज भी सभी धर्म समुदाय के लोग बच्चों में माता चेचक रोग निकलने पर मंदिर से नीर ले जाते हैं जिसे फिलाने से राहत मिलती है। जैसा की मंदिर के पुजारी श्री मदन चौधरी ने बताया। ✍.... जगदीश चंद्र मालवीय, आगर मालवा |