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नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका के बीच संभावित युद्ध ने भारत की चिंताओं को गंभीर बना दिया है। यदि यह संघर्ष व्यापक रूप लेता है, तो इसका सीधा और गहरा असर भारत की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन पर पड़ सकता है। सबसे बड़ा झटका कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के रूप में सामने आ सकता है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें पश्चिम एशिया की अहम भूमिका है। युद्ध की स्थिति में सप्लाई बाधित होने से पेट्रोल-डीजल के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं, जिससे महंगाई बेकाबू होने का खतरा है। सिर्फ ईंधन ही नहीं, बल्कि आम आदमी की जेब पर भी इसका असर पड़ेगा। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं। उद्योगों पर लागत का दबाव बढ़ेगा, जिससे आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। सुरक्षा के मोर्चे पर भी भारत के लिए चुनौती कम नहीं होगी। खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन सकती है। युद्ध की स्थिति में उन्हें सुरक्षित वापस लाने के लिए बड़े स्तर पर ऑपरेशन चलाना पड़ सकता है। इसके अलावा, भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन बनाना भी मुश्किल हो सकता है। एक ओर अमेरिका भारत का रणनीतिक साझेदार है, तो दूसरी ओर ईरान ऊर्जा और क्षेत्रीय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण देश है। ऐसे में भारत को बेहद सावधानी से कदम उठाने होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा चला, तो भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका असर गहरा और दीर्घकालिक हो सकता है। सरकार पहले से ही वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने की दिशा में कदम उठा रही है, लेकिन हालात बिगड़ने पर चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। |