रतलाम /ग्राम भूरिघाटी/हेवड़ा दामा खुर्द/रामपुरिया। खेती-किसानी में आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव स्थानीय और पारंपरिक बीजों के संरक्षण से ही तैयार होती है। पारंपरिक बीज केवल फसल उगाने का माध्यम नहीं, बल्कि किसानों की पहचान, पीढ़ियों से संचित कृषि ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के संवाहक भी हैं। इसी उद्देश्य को लेकर भूरिघाटी, हेवड़ा दामा खुर्द एवं रामपुरिया में रबी बीज उत्सव 2026 का आयोजन किया गया। वाग्धारा के मार्गदर्शन में आयोजित इस उत्सव में समुदाय के लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और स्थानीय बीजों को संरक्षित कर अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सामूहिक संकल्प लिया।
कार्यक्रम का संचालन मोहन भूरिया ने किया। इस अवसर पर आभा चरपोटा ने पारंपरिक बीजों के संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्थानीय बीजों को सहेजना हमारी कृषि परंपराओं और प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने पारंपरिक बीजों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के महत्व पर भी जोर दिया।
ब्लॉक सहजकर्ता रेणुका पोरवाल ने जल संरक्षण और आदिवासी संस्कृति के महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि जल, जंगल, जमीन और पारंपरिक ज्ञान आदिवासी समुदाय के जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर खेती करना और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना समय की आवश्यकता है।
वहीं, बलराम चरपोटा ने वाग्धारा संस्था के उद्देश्यों की जानकारी देते हुए समुदाय की भागीदारी से स्थानीय स्तर पर स्वावलंबन को मजबूत बनाने की आवश्यकता बताई।
बीजों की विविधता बचाने पर दिया जोर
रबी बीज उत्सव के दौरान स्थानीय एवं पारंपरिक बीजों की पहचान, उनके सुरक्षित भंडारण और संरक्षण के तरीकों पर चर्चा की गई। साथ ही, पारंपरिक कृषि ज्ञान को सहेजने तथा महिलाओं और बुजुर्ग किसानों के अनुभवों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर विशेष जोर दिया गया। वक्ताओं ने फसल विविधता को बढ़ावा देने और स्थानीय स्तर पर बीजों की उपलब्धता बनाए रखने की आवश्यकता भी बताई।
बीज संरक्षण और आपसी आदान-प्रदान की ली शपथ
उत्सव का महत्वपूर्ण पहलू समुदाय के सदस्यों द्वारा स्थानीय बीजों के संरक्षण, सुरक्षित भंडारण और उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की शपथ लेना रहा। उपस्थित लोगों ने आपस में बीजों का आदान-प्रदान करने तथा पारंपरिक बीजों और कृषि जैव विविधता को बचाने के लिए मिलकर प्रयास करने का संकल्प लिया।
इस पहल के माध्यम से संदेश दिया गया कि किसान यदि अपने पारंपरिक बीजों को सहेजने और उनका आपसी आदान-प्रदान करने की परंपरा को मजबूत बनाते हैं, तो स्थानीय स्तर पर बीजों की उपलब्धता बनाए रखने और कृषि में सामुदायिक स्वावलंबन को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
कृषि विरासत बचाने की सामूहिक पहल
कार्यक्रम में आभा चरपोटा, बालचंद डामोर, बलराम चरपोटा, रमेश चरपोटा, मंजू डामर, काली भूरिया, कपिल वसुनिया, शंकर मुनियां, विष्णु कटारा, मगन डोडियार, अनिल कटारा एवं प्रवीण चरपोटा सहित समुदाय के सदस्य उपस्थित रहे। कार्यकर्ता कमला बाई डोडियार और शिक्षिका संगीता सोरड़िया ने भी सक्रिय भूमिका निभाई।
रबी बीज उत्सव ने यह संदेश दिया कि पारंपरिक बीजों का संरक्षण केवल किसानों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत को बचाने का सामूहिक प्रयास है। स्थानीय बीजों को सहेजकर किसान अपनी परंपराओं को जीवित रखने के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कृषि की समृद्ध विरासत सुरक्षित कर सकते हैं।
संदेश: बीज बचाएं, विरासत बचाएं—प्रकृति के साथ सच्ची खेती अपनाएं और सामुदायिक स्वराज की दिशा में कदम बढ़ाएं।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत