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शारदीय नवरात्रि पर विशेष नारियल की चटक से श्रद्धालुओं को मिलता है, मनोकामना पूर्ण होने का संकेत माता की कृपा से संतान सुख पाने वाले श्रद्धालु बांधते है, पालना और झूले मध्य प्रदेश के आगर मालवा जिले के ग्राम पचेटी में श्री बाड़ी माता मंदिर, क्षेत्र के श्रद्धालुओं की जन आस्था विश्वास और मनोकामना पूर्ति का प्रमुख केन्द्र है। यह मंदिर जिला मुख्यालय आगर से लगभग 22 से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ग्राम पचेटी के समीप सघन वन क्षेत्र में स्थित होने के कारण इसका प्राकृतिक परिवेश अत्यंत रमणीय एवं शांत है। कानड़ मार्ग पर ग्राम बागरीखेड़ा के पास से टिल्लर बांध (पचेटी डेम) होते हुए पचेटी ग्राम पहुँचा जाता है। ग्राम से लगभग 01 किलोमीटर पूर्व दिशा में वन क्षेत्र में माताजी विराजित हैं। मंदिर की पश्चिम दिशा में जिले की वृहद सिंचाई परियोजना टिल्लर बांध स्थित है, जिसका निर्माण वर्ष 1990 में हुआ। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि स्थानीय जनश्रुति एवं मान्यता के अनुसार प्राचीन समय में इस स्थान पर घना जंगल था। जंगल में प्राचीन मूर्तियां विराजित होने की जानकारी मिलने पर धीरे-धीरे श्रद्धालुओं का आवागमन प्रारंभ हुआ। माताजी के चमत्कारों एवं मनोकामना पूर्ति की मान्यता के कारण भक्तों की संख्या में निरंतर वृद्धि हुई। कालांतर में स्थानीय जनसहयोग से यहाँ भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर में स्थापित प्रतिमा स्वयंभू मानी जाती है। विद्वानों एवं स्थानीय अभिलेखों के अनुसार मंदिर लगभग 500 वर्ष प्राचीन है। ग्राम पचेटी का नाम भी इसी मंदिर के नाम पर पड़ा माना जाता है। धार्मिक महत्व एवं मान्यताएं मनोकामना पूर्ति मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से की गई प्रार्थना से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। विशेष रूप से संतान प्राप्ति की कामना लेकर आने वाले दंपतियों की मनोकामना पूर्ण होने की अटूट मान्यता है। पालना / झूला परंपरा बाड़ी माता मंदिर पचेटी की यह विशिष्ट परंपरा है। जिन दंपतियों को श्री बड़ी माताजी के आशीर्वाद से संतान सुख प्राप्त हो जाता है, वे माताजी के दरबार में पालना, झूला एवं घंटी अर्पित कर अपनी मन्नत उतारते हैं। मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में टंगे हुए पालने एवं झूले इस परंपरा के साक्षी हैं। नारियल की चटक से माता देती है मनोकामना पूर्ण होने का श्रद्धालुओं को संकेत मंदिर के पुजारी श्री रमेश भिलाला ने चर्चा में बताया कि इस मंदिर की स्थापना से लेकर आज तक यहां भिलाला समाज के उनके परिवार जन पीढ़ी दर पीढ़ी माता जी की पूजा-अर्चना और सेवाएं करते आए हैं। उन्होंने बताया कि इस मंदिर में विराजित माताजी की प्रतिमा पर नारियल की चटक चढ़ाने और चटक के उसे स्थान से नीचे गिर जाने पर यह माना जाता है कि माता का आशीर्वाद मिल गया है मनोकामना पूर्ण हो जाएगी। ऐसी अनूठी अद्भुत परंपरा किसी और देवी मंदिर में देखने को नहीं मिलती हैं। यही कारण है कि यहां पर बड़ी माता जी के दर्शन के लिए और अपनी मन्नत पूरी होने पर मां को धन्यवाद देने कृति कृतज्ञता व्यक्त करने के श्रद्धालुओं का तांता लगा ही रहता है। पुजारी श्री रमेश जी ने बताया कि आसपास के 10 से 15 गांव के ग्रामीण श्रद्धालुओं के सहयोग से यहां माता मंदिर का नवनिर्माण किया गया है। आज क्षेत्र के ग्रामीणों के सहयोग से पचेटी में सफेद मार्बल का भव्य मंदिर है, जहां श्रद्धालु सुविधाजनक ढंग से माता के दर्शन कर मंदिर की परिक्रमा भी करते हैं। यहाँ नारियल की चटक द्वारा मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद मिलने की मान्यता है। भक्त नारियल अर्पित कर माता जी से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। सुरक्षित टिल्लर डेम और क्षेत्र में हरियाली और खुशहाली जनश्रुति एवं बुजूर्ग क्षैत्रवासियों का कहना है कि जब नब्बे के दशक में टिल्लर डेम का निर्माण हुआ, उसके एक दो वर्षों बाद ही अतिव़ृष्टि से डेम में अत्यधिक जलभराव होने से आसपास के गांवों में चर्चा चली की ज्यादा पानी की आवक से डेम क्षतिग्रस्त हो रहा है। पचेटी एवं आसपास के ग्रामीणो ने मॉ बाडी माताजी में प्रार्थना की कि हमारे टिल्लर डेम को कोई नुकसान न हो और वह सुरक्षित रहें। माताजी की कृपा से उक्त डेम को कोई नुकसान नहीं पहुंचा और आज तक टिल्लर डेम पूरी तरह सुरक्षित है तथा क्षैत्र के अनेकों गांवों में नहरों के माध्यम से सिंचाई का प्रमुख साधन होने के साथ ही क्षैत्रवासियों की खुशहाली और समृद्धि का आधार पर भी है। ऐसा ग्रामीणों का मानना है। पुजारी श्री रमेश जी एवं उनके परिवारजन मंदिर की स्थापना से लगाकर आज तक पीढ़ी दर पीढ़ी मंदिर की सेवा पूजा अर्चना करते आए हैं, मंदिर प्रबंधन समिति के माध्यम से ग्रामीणों द्वारा मंदिर की व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संपादित किया जाता है। पुजारी ने बताया कि इस मंदिर में मन्नत पूर्ण होने पर श्रद्धालुओं द्वारा माता को सांकेतिक रूप से मदिरा का भोग लगाने की परंपरा है और दशहरे पर तथा मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालुओं द्वारा बलि दी जाती है,जो श्रद्धालुओं की मनवांछित इच्छा पूर्ण होने पर दी जाती है। पट्टा परंपरा मंदिर के पुजारी श्री रमेश भीलाला एवं क्षेत्र में प्रचलित जनश्रुति के अनुसार नौकरी, विवाह, संतान सुख, नलकूप खनन करवाने के पूर्व पानी की आवाक आदि मनोकामनाओं हेतु भक्त माता जी से पट्टा लेते हैं तथा मनोकामना पूर्ण होने पर पुनः दर्शन कर आभार व्यक्त करते हैं। पूजा पद्धति एवं परंपरा मंदिर में प्रतिदिन सामान्य पूजा-अर्चना, आरती एवं भोग की परंपरा है। नवरात्रि के अवसर पर विशेष पूजा, घट स्थापना एवं भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। फाल्गुन पूर्णिमा के अवसर पर यहाँ पांच दिवसीय भव्य मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन हेतु आते है । मंदिर के समीप स्थित बावड़ी को पवित्र माना जाता है, जिसके जल के कभी न सूखने की मान्यता है। सांस्कृतिक एवं पर्यटन महत्व श्री बाड़ी माता मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केन्द्र है, अपितु आगर-मालवा जिले के ग्रामीण पर्यटन एवं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण स्थल भी है। वन क्षेत्र, टिलर बांध की निकटता तथा शांत वातावरण के कारण यह स्थल आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है। पहुँच मार्ग वायु मार्ग - निकटतम हवाई अड्डा देवी अहिल्या बाई होलकर हवाई अड्डा, इंदौर (लगभग 156 कि.मी.)। रेल मार्ग - निकटतम रेलवे स्टेशन उज्जैन (लगभग 98 कि.मी.)। सड़क मार्ग - आगर-मालवा सड़क मार्ग से जुड़ा है। आगर से कानड़ रोड होते हुए टिल्लर बांध (पचेटी डेम) मार्ग से मंदिर तक पहुँचा जा सकता है। जैसा कि बाडी माताजी (पचेटी माताजी) मंदिर के पुजारी श्री रमेश जी भीलाला ने बताया । ✍.... जगदीश चंद्र मालवीय |