मंदसौर। मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में धर्मराजेश्वर के नाम से जाना जाता मंदिर जो पत्थर की चट्टान को काटकर बनाया गया है। यहां पर महाशिव रात्रि का दिन बहुत ही खास माना जाता है। यहां दूर दराज से श्रद्धालु दर्शन करने के लिए बड़ी संख्या में आते हैं। ऐसा प्रतीत होता है। जैसे यह मंदिर आधुनिक इंजीनियरिंग को चुनौती दे रहा हो। लोगों का मानना है। यह मंदिर सदियों पुराना है। इस मंदिर में शिव और विष्णु दोनों एक ही गर्भगृह में विराजित हैं। शिव और विष्णु संप्रदाय के अलावा यहां पर बौद्ध गुफाएं भी मौजूद हैं। अपनी स्थापत्य कला को लेकर प्रसिद्ध है। लोगों का मानना कि यहां महाशिवरात्रि के दिन- रात्रि में रुकने पर मनुष्य जीवन की एक यौनी कम हो जाती है।जब सूर्य की पहली किरण मंदिर के गर्भगृह में जाती है। तब ऐसा लगता है। कि सूर्य भगवान स्वयं भगवान शिव और विष्णु के दर्शन करने के लिए मंदिर आते हों। यहां पर दर्शन करने से होती है आनंद की अनुभूति। विशाल मंदिर और यह देवालय ना सिर्फ भगवान शिव और विष्णु के मंदिर का प्रतीक है। बल्कि यह संसार का अकेला ऐसा मंदिर है। जो जमीन के भीतर होते हुए भी सूर्य की किरणों से सराबोर हैं। किवदंती है कि द्वापर युग में पांडव जब अपने अज्ञातवास के दौरान इस स्थान पर आए थे। तो भीम ने गंगा के सामने इसी जगह पर शादी का प्रस्ताव रखा था। जबकि गंगा भीम से शादी नहीं करना चाहती थी। इसीलिए गंगा ने भीम के सामने शादी की एक शर्त रखी थी। जिसके मुताबिक भीम को एक ही रात में चट्टान को काटकर इस मंदिर का निर्माण करना था। उसके बाद भीम की शर्त के मुताबिक 6 माह की एक रात बनाकर रात्रि में मंदिर का निर्माण किया गया था। इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर मूल रूप से विष्णु भगवान का मंदिर था। लेकिन बाद में यहां पर सेव मत के अनुयायियों ने भगवान शिव की भी स्थापना कर दी थी। मंदिर चौथी से पांचवीं शताब्दी का माना जाता है। यहां पर शिव और विष्णु मठ के अलावा बौद्ध गुफाएं भी हैं।
यहां पर जो भी श्रद्धालु सच्ची भावना से मन्नत मांगते हैं। उनकी मन्नत अवश्य पूरी होती है।
धर्म : आधुनिक इंजीनियरिंग को चुनौती दे रहा मंदसौर जिले का सदियों पुराना शिव मंदिर...जानिए इसका इतिहास..
मंदसौर। मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में धर्मराजेश्वर के नाम से जाना जाता मंदिर जो पत्थर की चट्टान को काटकर बनाया गया है। यहां पर महाशिव रात्रि का दिन बहुत ही खास माना जाता है। यहां दूर दराज से श्रद्धालु दर्शन करने के लिए बड़ी संख्या में आते हैं। ऐसा प्रतीत होता है। जैसे यह मंदिर आधुनिक इंजीनियरिंग को चुनौती दे रहा हो। लोगों का मानना है। यह मंदिर सदियों पुराना है। इस मंदिर में शिव और विष्णु दोनों एक ही गर्भगृह में विराजित हैं। शिव और विष्णु संप्रदाय के अलावा यहां पर बौद्ध गुफाएं भी मौजूद हैं। अपनी स्थापत्य कला को लेकर प्रसिद्ध है। लोगों का मानना कि यहां महाशिवरात्रि के दिन- रात्रि में रुकने पर मनुष्य जीवन की एक यौनी कम हो जाती है।जब सूर्य की पहली किरण मंदिर के गर्भगृह में जाती है। तब ऐसा लगता है। कि सूर्य भगवान स्वयं भगवान शिव और विष्णु के दर्शन करने के लिए मंदिर आते हों। यहां पर दर्शन करने से होती है आनंद की अनुभूति। विशाल मंदिर और यह देवालय ना सिर्फ भगवान शिव और विष्णु के मंदिर का प्रतीक है। बल्कि यह संसार का अकेला ऐसा मंदिर है। जो जमीन के भीतर होते हुए भी सूर्य की किरणों से सराबोर हैं। किवदंती है कि द्वापर युग में पांडव जब अपने अज्ञातवास के दौरान इस स्थान पर आए थे। तो भीम ने गंगा के सामने इसी जगह पर शादी का प्रस्ताव रखा था। जबकि गंगा भीम से शादी नहीं करना चाहती थी। इसीलिए गंगा ने भीम के सामने शादी की एक शर्त रखी थी। जिसके मुताबिक भीम को एक ही रात में चट्टान को काटकर इस मंदिर का निर्माण करना था। उसके बाद भीम की शर्त के मुताबिक 6 माह की एक रात बनाकर रात्रि में मंदिर का निर्माण किया गया था। इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर मूल रूप से विष्णु भगवान का मंदिर था। लेकिन बाद में यहां पर सेव मत के अनुयायियों ने भगवान शिव की भी स्थापना कर दी थी। मंदिर चौथी से पांचवीं शताब्दी का माना जाता है। यहां पर शिव और विष्णु मठ के अलावा बौद्ध गुफाएं भी हैं।
यहां पर जो भी श्रद्धालु सच्ची भावना से मन्नत मांगते हैं। उनकी मन्नत अवश्य पूरी होती है।